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उत्तर बस्तर कांकेर में 'कोविड' से संबंधित अनुभव : श्रीमती कलावती कश्यप संग साक्षात्कार

उत्तर बस्तर कांकेर की निवासी श्रीमती कलावती कश्यप बहुत छोटी उम्र से सामाजिक सेवा संबंधित परियोजनाओं का हिस्सा रही हैं। वे अपने आस पास के समाज में एक सशक्त महिला के रूप में प्रेरणा का स्रोत हैं। सन २००२ में उन्होने अपने कुछ साथियों संग सहभागी समाज सेवी संस्थान का गठन किया। और इस संस्थान में सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का वाहन कर रही हैं। सामाजिक सेवा संबंधित कार्यों को लेकर इनका अनुभव इस साक्षात्कार को महत्व प्रदान करता है। इस साक्षात्कार के माध्यम से यह समझने की कोशिश कि गयी है कि कोविड महामारी ने उत्तर बस्तर कांकेर के निवासियों को किस प्रकार प्रभावित किया है। ९ जून २०२० को हुए इस साक्षात्कार का सारांश कुछ इस प्रकार है।


कलावती जी बताती हैं कि महामारी से निपटने के लिए किये गए 'लॉक डाउन' की वजह से उनके जिले के लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है। शुरुवाती समय में उनके जिले में एक भी संक्रमित व्यक्ति नहीं था जिसके कारण वहाँ के लोगों को ना तो इस बीमारी की गंभीरता का अंदेशा हुआ और ना ही इसके कारण करे गए 'लॉक डाउन' की वजह को सही समझा। उनके अनुसार इस 'लॉक डाउन' से स्थानीय लोगों को संघर्षों से गुज़रना पड़ा है। वे बताती हैं कि मार्च के समय में गाँव के लोग जंगल से महुआ के फूल बीनते/चुनते हैं और इसी समय में तेन्दु पत्तों की तोड़ाई भी शुरू होती है। लॉक डाउन के कारण इन कार्यों में कुछ हद तक रुकावट हुई। साथ हीं व्यापारियों तक बिने हुए वन उपजों को पहुंचाने में भी काफी संघर्ष रहा। सबसे अधिक मार रही भूमिहीन लोगों पर। ये लोग दैनिक मजदूरियों से अपना जीवन बसर करने वाले लोग हैं इसलिए इनके रोज़गार को भारी धक्का लगा। इसके अलावा लॉक डाउन के समय में पकी हुई फसलों को किसान जन बाजार तक नहीं पहुंचा पाए। लघु उद्योग जैसे की सब्ज़ी उगाने वाले किसान भी तकलीफ़ में रहे।

कलावती जी बहुत स्पष्ट रूप से समझती हैं कि यह बीमारी हवाई जहाज से उड़ने वाले लोगों की वजह से पूरे विश्व भर में फैली है। एक लम्बे समय तक कांकेर में संक्रमण नहीं पहुँचा था। पर प्रवासी मजदूरों के घर लौटने के साथ संक्रमण भी कांकेर आ पहुंचा। वे बताती हैं कि लॉक डाउन के चलते शहरों में कारखाने एवं मजदूरी के काम भी बंद हो गए। इस वजह से प्रवासी मजदूरों के पास घर लौटने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा रहा। उन्हे घर लौटना ही पड़ा। प्रशासन द्वारा हर पंचायत में संगरोध (क्वारंटाइन) की सुविधा प्रदान कि गयी पर फिर भी संक्रमण फैल गया। सभी लौटे हुए लोगों को एक साथ रखा गया जिससे संक्रमण फैल गया। प्रवासी मजदूरों के संगरोध को शायद बेहतर तरीके से संचालित किया जा सकता था।

लॉक डाउन के समय बेरोज़गारी से निपटने के लिए सरकारी प्रशासन द्वारा मनरेगा (MGNREGA) पर ख़ास ज़ोर दिया गया। जिसके चलते लोगों को सहयोग मिला। इस दौरान शारीरिक दूरी का पूरा ध्यान रखा गया। संक्रमण जब बढ़ा तो स्थानीय लोगों ने सरकारी मदद के अलावा अपने खुद के स्थानीय समाधान भी निकाले। जैसे की लोगों ने खुद से मास्क बनाने सीखे।


कलावती जी ने अपनी संस्थान के माध्यम से एक हज़ार से भी ज़्यादा परिवारों तक राशन का वितरण किया। औसत रूप से चौदह दिनों तक चल जाने लायक राशन बाँटा गया। इसके साथ उन्होने गाँव में, बीमारी संबंधित, सही जानकारी का प्रचार भी किया। दीवारों पर लेखन का कार्य किया जिससे कि सही जानकारी लोगों तक पहुंच सके। गाओं में सामाजिक स्थलों (राशन दुकाने एवं हैंड पंप) पर शारीरिक दूरी बनाये रखने के लिए सफ़ेद चूने से गोलाकार बनाये गए। महामारी का यह समय लोगों को काफी डरा रहा है पर संस्थान अपनी तरफ से संभव सहयोग दे रही है।


मैं कलावती जी को इस साक्षात्कार के लिए अपना धन्यवाद कहती हूँ। मुझे आशा है कि कलावती जी द्वारा प्रस्तुत जानकारी हमारे पाठकों तक कांकेर के संघर्ष और कोशिशों की कहानी पहुंचा सके।



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