Search
  • Swarnima Kriti

गोंड विवाह की प्रथाएं: आशा है इस बदलते वक़्त में ये प्रथाएं न गुज़र जाएं

लड़के की शादी की उम्र होने पर घर वाले उसे शादी करने के लिए कहते हैं। माँ लड़के से अनुरोध करती है की उसकी उम्र को देखते हुए लड़का बहू घर ले आये। जब लड़का शादी के लिए मान जाता है, परिवार वाले गांव के सियान (बुज़ुर्गों) की मदद ले कर लड़की खोजने की कोशिश करते हैं। वे अपने सगे-सम्बन्धियों के माध्यम से दूर-दूर तक अपने लड़के के लिए लड़की का पता लगाते हैं। किसी अच्छे परिवार के मिलने पर निश्चित रूप से उनके वंश और गोत्र के बारे में पूछा जाता है। इस प्रकार की सभी जानकारी पाने के बाद लड़के वाले अपने आने की सूचना लड़की के परिवार तक पहुंचाते हैं। तय किये दिन पर लड़के वाले अपने गांव के सियान के साथ लड़की के परिवार से मिलने जाते हैं। दोनों परिवार वाले लड़के और लड़की से उनकीपढ़ाई और काम के बारे में बात करते हैं। इस मुलाक़ात में लड़की और लड़के की सहमति बहुत ज़रूरी होती है। दोनों की सहमति के बाद ही रिश्ता तय किया जाता है। दोनों परिवार कीख़ुशी होने पर लड़के और लड़की की राशि देख कर फलदान (सगाई) का दिन तय किया जाता है।फलदान का निमंत्रण सभी सगे-सम्बन्धियों के घर जाकर या फ़ोन से दिया जाता है। फलदान के कुछ दिन पहले से ही सगे-सम्बन्धी घर आना शुरू कर देते हैं। यह रस्म अदायगी लड़की के घर पर होती है, इसकी तैयारी के लिए गांव के लोग भी मदद करते हैं।इस दिन घर की साफ़-सफाई और लिपाई-पोताई की जाती है।

फलदान की रस्में: फलदान के दिन लड़के के तरफ से लड़की के लिए श्रृंगार का सामान लाया जाता है। लड़की फलदान की पूजा के लिए उसी श्रृंगार के सामान का इस्तेमाल कर तैयार होती है। इस पूजा में लड़की और लड़का एक दूसरे को फूलों से बनी माला और अंगूठी पहनाते हैं। जैसे-जैसे पूजा आगे बढ़ती है, अलग-अलग रस्मों को निभाया जाता है। लड़का-लड़की को मंगलसूत्र पहनाता है जिसके बाद लड़की उसके पैर छूती है। आख़िरी रस्म समधी-मिलन की होती है। लड़का, लड़की और उनके दोस्त (लोकड़ाहीन व् लोकड़ाहा) सभी बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं। लड़की वाले निवेदन करते हैं कि उनकी बेटी का अच्छे से ख्याल रखा जाए और इस दौरान कोई भूल-चूक हुई तो उन्हें माफ़ किया जाये। आखिर में सभी साथ में 'जय बूढ़ादेव' कह कर अपने परम देव का आशीर्वाद लेते हैं और खाने के लिए बैठते हैं। फलदान के पश्चात शादी का शुभ मुहूर्त निकलवाया जाता है।

शादी की तैयारियां:शादी के दो दिन पहले लड़के के घर में 'खरही पोती' नामक रस्म करते हैं। इस रस्म को पूरा करने के लिए लड़की के पिता और गांव के कुछ सियान के साथ लड़के के घर जाते हैं। इस रस्म के लिये दाल, चावल और झाड़ु की ज़रूरत होती है। दाल और चावल के दो - दो दानों को पानी में डाला जाता है। पानी में तैरते दाल और चावल के दाने जब संपर्क में आते हैं तो उसे 'लगीन पोती' (या खरही पोती) की रस्म कहते हैं। अंत में दोनों परिवार भोजन करते है और लड़की वाले वापस अपने गांव चले जाते हैं।

शादी के दिन की रस्में:शादी के दिन गांव के लोग लड़की के घर 'डारा डालने' जाते हैं। इस रस्म के माध्यम से शादी के घर की पहचान होती है। लोगों के आगमन को सराहा जाता है और उन्हें चाय पानी दिया जाता है। डारा डालने की रस्म के मुताबिक गांव के लोग चिरईजाम या अमरुद की डाल घर में लाते हैं। जिसके बाद वे डाल में प्याज़, मिर्च, उपला और पेरा (पुआल) मिला कर दरवाज़े के पास या छत पर डालतेया गाड़ते हैं। ऐसी ही एक पोटली मड़वे (मंडप) के पास भी रखी जाती है। शाम के वक़्त सभी लोग बाजे-गाजे के साथ पूजा करते हुए 'चुलमाटी' लाने जाते हैं। गांव के एक धार्मिक स्थल से मिट्टी लायी जाती है। इसी मिट्टी से घर के आँगन में लकड़ियों के मड़वे को को गाड़ा और सजाया जाता है। गोंड प्रथा को ध्यान में रखते हुए मंगलवार और शनिवार को 'चुल माटी' की रस्म नहीं करते हैं।

शादी के घर में खाना बनाने के लिए समाज और गांव के लोगों से काफी मदद मिलती हैं। समाज या गांव के स्तर पर समूह में लोगों की पारी बाँधी जाती है। लोग बारी-बारी से अपना काम करते हैं, जिसकी वजह से शादी के घर में हमेशा खाना मिलता है। सबसे पहले घर की बाड़ी में बड़े-बड़े चार चुल्हे बनते हैं। चूल्हे के बन जाने पर उसकी पूजा की जाती हैं। पूजा खत्म होने के बाद ही खाना बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है।

शाम के वक्त, गांव के सभी लोग लड़के या लड़की को देखने आते हैं। रात को लड़के और लड़की पर तेल और हल्दी चढ़ाना शुरू किया जाता है। लड़की के बुआ और फूफा डेढ़ा-डेढ़ीन बनते हैं। डेढ़ा-डेढ़ीन ही शादी की सभी रस्में करते हैं। वे मड़वे के चारो तरफ घूमते हैं और वहीँ बैठते हैं। इसके बाद लड़की आती है और उनकी गोद में बैठती है। मड़वे में रखी एक बड़ी सी लकड़ी के ऊपर तीन जगह चावल डाला जाता है, और उसी लकड़ी पर लड़की को बैठाया जाता है। सबसे पहले डेढ़ा-डेढ़ीन लड़की को तेल-हल्दी लगाते हैं और मड़वे पर भी चढ़ाते हैं। इस प्रक्रिया को चार बार दोहराया जाता है। इसके बाद ही सारे सगे-सम्बन्धी और गांव के लोग इस रस्म को करते हैं। तेल चढ़ाने की रस्म बाजे गाजे के साथ होती है। रात भर तेल चढ़ाने के साथ ही गांव के लोग मड़वे के आस-पास नाचते हैं। अगले दिन सुबह हर घर से कुछ लोग थाली में दाल, चावल, आलू, प्याज़ सजा कर लाते हैं। घर-घर से आये लोग तेल हल्दी तीन बार उतार कर इस रस्म को पूरा करते हैं। यह समय मौज और मस्ती से भरा होता है, जिसमें गांव के सभी लोग (बच्चों से ले कर बूढ़े) शामिल होते हैं। लोग एक दूसरे को हल्दी और रंग लगाते हैं। होली जैसा जश्न और माहौल बन जाता है। तपती गर्मी होने के कारण लोग एक दूसरे पर पानी में रंग मिला कर भी डालते हैं। यह रस्म दोपहर तक चलती हैजो लड़की के नहाने के बाद खत्म होती है। लड़की को सभी मिलकर एक पर्रे (बांस की टोकरी) में उठाते हैं और ऊपर से पानी डालते हैं। इसके बाद लड़की कपडे बदल कर अपने दोस्तों के साथ खाने के लिए बैठती है। लड़के के घर भी सभी रस्में इसी प्रकार निभाई जाती हैं। नहाने के दौरान लड़की को किसी भी साबुन का इस्तेमाल करना मना होता है। धीरे-धीरे सभी सराती तैयार होते हैं। शाम तक दुल्हन को सजा कर तैयार रखा जाता है। शाम तक दूल्हे के घर से बारात भी आ जाती है। बारात के गांव पहुंचने पर उनका स्वागत किया जाता है। उनके लिए चाय नाश्ते की तैयारी की जाती है। दूल्हे के लिए उसकी सालियाँ (दुल्हन की दोस्त व बहनें) लाल भाजी, तेल, कंघी और दर्पण ले जाती हैं। इस रस्म को लाल भाजी रस्म कहा जाता है, जिसमे सालियाँ दूल्हे को तैयार करके दुल्हन के घर ले जाती है। दूल्हे को उनकी सालियाँ दर्पण दिखाती हैं और सात बार लाल भाजी खिलाती हैं। पारम्परिक रूप से इस रस्म के बाद सालियाँ दूल्हे की गोद में बैठती हैं जब तक इस रस्म के लिए उन्हें नेग नहीं मिलता।

कुछ वक्त के बाद सराती बाजे-गाजे के साथ बारातियों को लाने जाते हैं। दूल्हा जब लड़की के दरवाज़े पर पहुँचता है तब लड़की भी घर से निकल कर बाहर आती है। दुल्हन दूल्हे की आरती उतारती है और तिलक करती है। रस्म के अनुसार दूल्हा छत पर रखे पर्रे को तीन या सात बार मारता है। घर के दरवाज़े पर जयमाला की रस्म जाती है। इसके बाद दुल्हन दूल्हे का हाथ पकड़ कर घर के अंदर ले जाती है। दूल्हा-दुल्हन को जयमाला के बाद एक कमरे में बैठाया जाता है, और दूल्हे के तरफ से लाये गए श्रृंगार के सामान को दुल्हन को दिया जाता है। दूल्हे के घर से आये सभी श्रृंगार के सामान से दुल्हन फिर से सजती है।

दुल्हन जब सज कर बाहर आती है तब दूल्हा-दुल्हन को मड़वा पर लेकर जाया जाता है। सबसे पहले मौर (बॉस का बना मुकुट) सौंपने की रस्म की जाती है। मौर की रस्म में दूल्हा-दुल्हन अपने-अपने हाथों में चावल और दिया पकड़ते है, जिसके बाद दोनों के सर पर मौर बांधा जाता है। दूल्हे के परिवार से कोई भी पुरुष सदस्य और दुल्हन के परिवार से कोई पुरुष सदस्य के द्वारा दोनों को गोद में उठाया जाता है। दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे को चावल से मारते हैं। इस रस्म के बाद गांठ-बंधन की रस्म की जाती है। गांठ-बंधन के समय दोनों को एक-एक पर्रे (बांस की बनी टोकरी) में, सात कदम की दुरी पर खड़ा कराया जाता है। दोनों के कंधे पे रखी धोती और साड़ी में हल्दी, चावल और एक रूपये के सिक्के को सात गाँठ दे कर बाँधा जाता है। दोनों मिलकर सात कदम चलते है, फिर उन्हें एक ही पर्रे में खड़ा कराया जाता है। गांठ-बंधन के बाद दूल्हा-दुल्हन मड़वे के चारो तरफ सात फेरे लेते हैं।

शादी के रस्मों के बाद टिकावन की रस्म शुरू होती है। टिकावन वह रस्म होती है जिसमें दूर दूर से आये सगे-सम्बन्धी नए जोड़े को हल्दी से रंगे चावल से तिलक (टिकना) करते हैं। तिलक लगा कर वे अपनी इच्छा से नए जोड़े के लिए नेग स्वरुप कुछ पैसे देते हैं। तिलक और नेग दोनों ही रिश्तेदारों का आशीर्वाद माना जाता है। समय के साथ गोंड शादियों का स्वरुप बदल रहा है। पहले नए जोड़े को मड़वे में ही टिकावन के लिए बैठाया जाता था। अब ज्यादातर परिवारों में टिकावन के लिए लकड़ी का मंच बनवाया जाता है। इस मंच को फूल, झालर आदि से सजाया जाता है। मंच के एक ओर डी. जे. (संगीत सयंत्र) की व्यवस्था की जाती है। यह व्यवस्था बच्चों ओर युवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र होता है। मंच पर नए जोड़े के लिए राजा-महाराजा वाली कुर्सी भी लगायी जाती है। नए जोड़े के इन कुर्सियों पर बैठने के बाद ही टिकावन की रस्म शुरू की जाती है। कुर्सियों के बगल में दूल्हा और दुल्हन का साथ देने और उनका ध्यान रखने के लिए लोकड़ाहिन और लोकड़ाहा बैठते हैं। साथ ही मंच के नीचे नेग की राशि और उपहार जमा करने के लिए व्यवस्था की जाती है।

टिकावन की रस्म खत्म करके सभी खाने के लिए प्रस्थान करते है। खाने की जगह पर चटाई बिछी होती है, जहाँ अतिथिगण पंक्ति में बैठते हैं । खाना बाँटने का काम अधिकतर छोटे बच्चे और युवा लड़के करते है। यहाँ की शादियों में खाना तीन भाग में परोसा जाता है। सबसे पहले बड़ा, पुड़ी, खीर और लड्डू परोसा जाता है, इसके बाद चावल, दाल, दो-तीन प्रकार की सब्जियां और सलाद परोसा जाता है। आखिर में खाना एक बार फिर परोसा जाता है जिसे ‘दूसरिया’ भी कहते हैं। खाने के बाद सभी अतिथि वापस अपने घर चले जाते हैं। शादी ख़त्म होने के बाद दूल्हे और दुल्हन को कमरे में बैठाया जाता है। दोनों परिवार मिलकर नेग के सामन और राशि को गिनते है। नेग का सामान दुल्हा-दुल्हन को दिया जाता है और शादी के दिन मिली नेग की राशि लड़की के परिवार को मिलती है।

विदाई के वक़्त दूल्हा-दुल्हन को फिर से मौर सौंपा जाता है। मौर सौपाई में दिये के तेल को हाथों में मल कर घर के बड़े दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देते हैं। दुल्हन घर से निकलते समय हाथ में चावल लेकर पीछे की तरफ फेंकती है और दुल्हन की माँ अपने आँचल में उस चावल को इकट्ठा करते हुए चलती है। गाड़ी में बैठने से पहले दुल्हन का भाई, दुल्हन को गुड़ खिलाता है, सात बार उसके चारो तरफ घूमकर उसे पानी पिलाता है। दुल्हन के साथ घर के कुछ लोग और गांव की कुछ लड़कियां जाती हैं। दूल्हा-दुल्हन और उनके साथ आए लोगों को, लड़के के गांव पहुंचने पर, किसी जानकार या रिश्तेदार के घर रखा जाता है। रात भर सभी लोग इसी घर में रुकते हैं। सुबह सभी के तैयार होने और नाश्ता करने के बाद दूल्हे के परिवार के लोग बाजे-गाजे के साथ सभी लोगों को लेने आते हैं। इस दिन दूल्हा-दुल्हन उपवास रखते हैं। घर के दरवाज़े पर परिवार के लोग दूल्हा-दुल्हन के पैरों पर पानी डालते हैं और आरती करते हैं। इस रस्म को पूरा कर दूल्हा-दुल्हन को घर के अंदर मड़वे के पास लाया जाता है। मड़वे पे नए जोड़े को बैठा कर परिवार वाले उन्हें मौर सौंपते हैं। यह रीति बड़े धूम-धाम और बाजे-गाजे के साथ मनाई जाती है, जिसके बाद दूल्हा-दुल्हन आराम करते हैं। शाम को दुल्हन के गांव से अतिथि आते हैं, इस प्रथा को चौहथिया कहते हैं। दुल्हन के सगे-सम्बन्धियों को भी किसी जानकार के घर रुकवाया जाता है और थोड़ी देर आराम करने के बाद दूल्हे के परिवार वाले उन्हें बाजे के साथ परघाने (आदर पूर्वक लेने) जाते हैं।

इसी दौरान दूल्हा-दुल्हन को टिकावन के लिए तैयार किया जाता है और मंच या मड़वे पर बैठाया जाता है। टिकावन के बाद सबसे पहले चौहथिया आये अतिथियों को खिलाया जाता है। सभी के खाने के बाद गठबंधन खोलने की रस्म होती है जिसे दूल्हे के बहनोई (बहन के पति) करते हैं। इस रस्म के लिए दूल्हे के भाई उन्हें नेग देते हैं। गठबंधन खुलने के बाद दूल्हा और दुल्हन खाना खाते हैं। अंत में बेटी और दामाद को खिला कर और उन्हें आशीर्वाद दे कर लड़की के परिवार वाले विदा लेते हैं।


हेमा मंडावी

कक्षा 12

ग्राम – मार्दापोटी

धमतरी, छत्तीसगढ़।

0 views

© Chinhari - 2019