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'गोंड विवाह की रीतियाँ और उनमे झलकती प्रकृति की कृतियाँ' - सूर्या कुमार ध्रुव

गोंड जनजाति में कुल ७५० (सात सौ पच्चास) गोत्र सम्मिलित हैं। उत्तर बस्तर कांकेर में रहने वाले हमारे साथी माधव नरेटी जी बताते हैं कि गोंड समाज में कुल बारह देव हैं। इन देवों का दो भाग में विभाजन किया गया है - विषम एवं सम (जिसे अंग्रेज़ी में औड और इवन की भाषा में समझा जाता है)। इसका मतलब यह है की विषम में आएँगे १-३-५-७-९-११ (एक - तीन - पांच - सात - नौ - ग्यारह) वाले देव और सम में आएँगे २-४-६-८-१०-१२ (दो - चार - छह - आठ - दस - बारह) वाले देव। गोंड समाज में होने वाले ७५० (सात सौ पच्चास) गोत्रों को इन देवों के अनुसार बांटा गया है। एक से लेकर सात तक के हर एक देव के साथ सौ गोत्र जुड़े हुए हैं। आठ से लेकर बारह तक हर एक देव के साथ दस गोत्र जुड़े हुए हैं। इस तरह से कुल ७५० का जोड़ बनता है। इसका यह मतलब है की हर गोत्र वाला अपने निर्धारित देव का ही स्मरण करता है और अपने जीवन की सुखद अभिभूती के लिए अपने देव से प्रार्थना करता है। गोंड समाज को इस तरह संयोजित करने का मार्ग दर्शन समाज के गुरु कुपार लिंगो द्वारा प्रदान किया हुआ है। हमारे लोगों का मानना है की सम वाले गोत्र आपस में भाई होते हैं इसलिए इनके बीच विवाह नहीं हो सकता। इसी तरह विषम वाले गोत्र आपस में भाई समझे जाते हैं। परन्तु सम का कोई भी गोत्र विषम के किसी भी गोत्र में विवाह रच सकता है।


जाति भले एक है परन्तु फिर भी एक जिले से दूसरे जिले में गोंड रीतियों एवं नीतियों में विभिन्नता देखी जा सकती है। मैं इस लेख के माध्यम से, उत्तर बस्तर कांकेर में स्थित, गोंड समाज में होने वाले विवाहों की रीतियों का वर्णन प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस वर्णन को प्रस्तुत करने के पीछे एक ख़ास उद्देश्य है। मैं यह दर्शाना चाहता हूँ की आदिवासी समुदाय में प्रकृति का एक ख़ास स्थान है जो की इस समुदाय के लोगों की रोज़ मर्रा ज़िन्दगी में झलकता है। हमारे यहां हर एक गोत्र का अपना एक निर्धारित वनस्पति, पक्षी और जानवर होता है, जिसके संरक्षण की ज़िम्मेदारी उस गोत्र के लोगों के हाथों में होती है। इस तरह से हर एक गोत्र के हिस्से में तीन जीव हैं। तोह कुल ७५० गोत्रों के हिस्से में आये २२५० (दो हज़ार दो सौ) जीव। इसलिए मैं यह मानता हूँ की हमारी गोंड सभ्यता में प्रकृति बहुत अहम है। हमारे लोगों का जीवन प्रकृति के इर्द गिर्द ही घूमता है। प्रकृति एवं जंगल से हमारे लोगों का जोड़ हमारे सामाजिक रीति रिवाजों में भी झलकता है। इस लेख में मैं गोंड समुदाय में होने वाले विवाहों की रीतियों में प्रकृति (ख़ास रूप से जंगल) की भूमिका दर्शाना चाहता हूँ। विवाह की रीतियों को जंगल से लाए गए फल, फूल, पत्तियां एवं लकड़ियां के बिना निभाया नहीं जा सकता। गोंड विवाह इस लेख में एक उदहारण के रूप में प्रस्तुत हैं। मुख्य उद्देश्य है की इस उदहारण के माध्यम से आदिवासी जीवन में जंगल की महत्वपूर्णता को समझा जा सके।


रिश्ता जोड़ने की प्रक्रिया को हमारे यहाँ मंगनी कहते हैं। अब मैं गोंड विवाह के प्रकारों से आपका संक्षिप्त में परिचय करवाना चाहता हूँ। मुख्य रूप से सात प्रकार के विवाह होते हैं - टीका विवाह, बड़े विवाह, मंझली विवाह, पैठू विवाह, उड़रिया विवाह, जयमाला विवाह एवं करसा विवाह। इस लेख में मैं टीका विवाह से सम्बंधित नेंग (नियम) एवं रीतियों को प्रस्तुत करूंगा। टीका विवाह का विवरण मैंने इसलिए भी चुना है क्यूँकि पहले इसी तरीके को सबसे अधिक चुना जाता था परन्तु अब विवाह का यह तरीका कम ही देखने को मिलता है। इस विवाह में दूल्हा बरात लेकर दुल्हन के यहां पहुँचता है। पर मड़वा (मंडप) दूल्हे के यहीं तैयार किया जाता है। बरात दुल्हन को अपने साथ लेकर दूल्हे के घर में बने मड़वा पर ही विवाह के नेंग निभाते हैं। इस विवाह में होने वाली रीतियों का वर्णन एवं इन रीतिओं में प्रकृति (एवं वनोपज) की भूमिका कुछ इस प्रकार है-


१) चुल्हा नेंग - यह तब किया जाता है जब कोई अपने लड़के की मंगनी करता है। इस अवसर पर महुआ के फूलों का रस बनाया जाता है। लड़की पक्ष के तैयार होने के पश्चात दोनो पक्ष के प्रमुख सियान और परिवार जन अपने कुल के देवता और ग्राम देवता को महुआ का रस अर्पण करते हैं। इसके पश्चात महुआ के रस का सामूहिक सेवन किया जाता है। इस रीति के पूर्ण होने पर ही रिश्ते को पक्का समझा जाता है और दोनो परिवार सामाजिक बंधन में बंध जाते हैं।




२) फलदान - इस रीति के लिए लड़के के पक्ष वाले लड़की के घर जाते हैं। साथ में लड़की के लिए नए वस्त्र एवं श्रृंगार लेके जाते हैं। इस अवसर पर गांव वालों को आमंत्रित किया जाता है। लोगों के एकत्रित होने के पश्चात गांव के शीतला माता के पुजारी के द्वारा पूजा स्थल को गोबर पानी से लीपा जाता है। रंगोली भी बनाई जाती है। गौरा-गौरी की स्थापना करने के पश्चात उनकी वन्दना की जाती है। इसी समय पर दुल्हन को उपहार प्रस्तुत किये जाते हैं एवं उसका श्रृंगार किया जाता है। दुल्हन को अपने होने वाले ससुर जी की गोदी में बिठाया जाता है। सामूहिक रूप से दो परिवार एक दूसरे को स्वीकार करते हैं। इस अवसर पर समाज के लोगों में लाई, मुर्रा, गुड एवं करी लड्डू बाटें जाते हैं।


३) टीका विवाह - गाँव के सामाजिक भाईयों द्वारा दो 'महलिया' को सन्देश वाहक के रूप में चुना जाता है। दूल्हा और दुल्हन के घरवालों के बीच नेंग (नियम) के सामान का आदान प्रदान करने की जिम्मेदारी इन दो 'महलिया' को दी जाती है। विवाह कार्यक्रम के पहले, महलिया द्वारा, दुल्हन के घर संदेश भिजवाया जाता है। सन्देश भिजवाने के पश्चात ही दूल्हा और उसका परिवार दुल्हन के घर पहुंचते हैं। दुल्हन के घर सगाई का रीति निभाया जाता है। तत्पश्चात भोजन की व्यवस्था की जाती है। भोजन की समाप्ति पर बिदाई का सिलसिला शुरू होता है। दुल्हन के साथ उसकी सहेलिआं भी आती हैं।


४) पानी ग्रहण - दुल्हन के घर से जब बरात दूल्हे के यहां पहुँचती है तब पानी ग्रहण की रीति निभाई जाती है। यह रीति तालाब के किनारे क्रियान्वित की जाती है। परिवार में से किन्ही दो व्यक्तियों को लंबा घास द्वारा झाड़ू बनाने की जिम्मेदारी दी जाती है। इस घास को अर्धगोलाकार कृति में दो व्यक्ति पकड़े रहते है। दुल्हा-दुल्हन को गायता (शीतला माता के पुजारी) के द्वारा इस अर्धगोलाकार के चारों तरफ छह चक्कर कटवाए जाते हैं। सातवे चक्कर के समय दूल्हा और दुल्हन को इस अर्ध गोले के बीच से निकलना होता है। इस नियम में जल की देवी कैयना को खुश करने के लिए मुर्गी की बली दी जाती है।



५) चूलमाटी - गौठान से चूलमाटी मंगवाई जाती है। मिट्टी लाने की ज़िम्मेदारी गांव की महिलाओं को दी जाती है। और ख़ास इसी मिट्टी से मड़वा का चबूतरा बनवाया जाता है।



६) मड़वा निर्माण - मड़वा बनाने के लिए निम्न लिखित सामग्री का उपयोग किया जाता है जैसे की जामुन के पेंड़ की पत्तियों से बना डंगाल, साझा वृक्ष की बल्ली से बना मड़वा का आधार, एवं महुआ वृक्ष से बनाया गया मूड़ा। इसके अलावा घास (खदर) से बना मड़वा का आधार, छींद के पत्तों से बना मौरा, मिटटी से बना कलसा एवं दीया, आम के पत्तों का तोरण, इत्यादि। इस तरह से, वन से मिले उपज ही, अलग अलग रूप में और अलग अलग नेंग (नियम) निभाने में भूमिका निभाते हैं।


७) मड़वा पूजा - विवाह स्थल को गोबर पानी से लीपा जाता है। रंगोली सजाई जाती है। कलस दीपक जलाए जाते हैं। उसके बाद ग्रामीणों के समक्ष गायता के द्वारा मड़वा पूजा की जाती है।





८) चोरतेल - यह रीति विवाहित महिलाओं एवं पुरुषों द्वारा निभाई जाती है।गायता के परिवार जन द्वारा भंडारी कमरा (जहां विवाह का राशन एवं सामग्री रखी जाती है) के भीतर दरवाज़ा बंद करके विवाहित जोड़ों द्वारा दूल्हे को तेल-हल्दी चढ़ाया जाता है। इस रीति के पश्चात मड़वा में रात-भर नाचा और गाना किया जाता है।



९) माई सत्ता की रीति - यह रीति दिन के मध्य भाग में की जाती है। इस रीति के माध्यम से दूल्हा और दुल्हन के परिवार जन एक दूसरे से परिचित होते हैं।

१०) तेल उतारने की रीति - दुल्हन और दूल्हे को पर्रा में बिठा कर मड़वा के चारों और चक्कर लगवाए जाते हैं। साथ में नाचा और गाना होता है।

११) लगन एवं टिकावन - इसे आशीर्वाद समारोह के रूप में मनाया जाता है और इसी के साथ विवाह को संपन्न किया जाता है।


इस लेख द्वारा मैंने उत्तर बस्तर कांकेर में रहने वाले गोंड समाज के विवाह की रीतिओं का विवरण दिया है। इन रीतिओं के क्रियान्वन में जंगल से उपजे हुए पेड़, फल, फूल, पत्ते, लकड़ियां, घास, इत्यादि की ख़ास भूमिका है। मुझे उम्मीद है की अपने इस लेख से मैंने इस भूमिका को अपने पाठक तक पहुंचाया है। इन रीतिओं में आदिवासी समुदाय के जंगल से जुड़े हुए जीवन की एक छोटी सी झलक सामने आती है।


लेखक का परिचय - यह लेख सुर्या कुमार ध्रुव द्वारा प्रस्तुत है। लेखक जिला उत्तर बस्तर कांकेर के निवासी हैं और सहभागी समाज सेवी संसथान के साथ विकास सम्बंधित परियोजनाओं से जुड़े हुए हैं। इस लेख को पाठकों तक पहुंचाने में दिनेश कुमार कुड़बेर का ख़ास योगदान रहा है।


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